Thursday, September 30, 2010

प्रशंसा

"आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते है और हम अन्दर की ओर| बताइए इन दोनों में से कौन का तरीका श्रेष्ट है ? " पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीदुद्दीन से पूछा|

फकीर ने बड़ी बुद्धिमतापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया - "महाराज | मुस्लमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकलने का प्रयास करते है, जबकि हिन्दू अन्दर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते है | "

प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की|

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Wednesday, June 30, 2010

" सबसे बड़ा मुर्ख "

इन्सान को अंत तक बोध नहीं हो पाता की क्यों वे इस धरती में जन्मे है व क्या उन्हें करना है ? मखौल में ही जिंदगी काट देते है | एक साधू तीर्थ यात्रा पर निकले | मार्ग - व्यय के लिए किसी सेठ से कुछ माँगा , तो उसने कुछ दिया तो नहीं , पर अपना एक काम भी सौप दिया |
एक बड़ा दर्पण हाथ में थमाते हुए कहा - " प्रवास काल में जो सबसे बड़ा मुर्ख आपको मिले उसे दे देना | " संत बिना रुष्ट हुए उसका काम कर देने का वचन देकर दर्पण साथ में ले गए | बहुत दिन बाद वापस लौटे, तो सेठ को बीमार पड़े पाए | संगृहीत धन से वे न अपना इलाज करा पाए और न किसी सत्कर्म में लगा पाए | मरनासन स्तिथि में सम्बन्धी , कुटुम्बी उसका धन , माल उठा - उठाकर ले जा रहे थे | सेठजी को मृत्यु और लूट का दुहरा कष्ट हो रहा था | साधू ने सारी स्तिथि समझी और दर्पण उन्ही को वापिस लौटा दिया | कहा - " आप ही इस बीच सबसे बड़े मुर्ख मिले , जिसने कमाया तो बहुत , पर सदुपयोग करने का विचार तक नहीं उठा | " http://www.manmanthan.com

Tuesday, May 4, 2010

"प्रार्थना की शक्ति"

भगवान् श्री कृष्ण का एक अनन्य भक्त था | वह बृन्दावन में प्रभु की उपासना में लीन रहता था | घंटो प्रभु के अलौकिक रूप को निहारता , परन्तु गिरधर ने उसे कभी भी दर्शन नही दिए | एक दिन भक्त हताश होकर चिल्लाने लगा - मै बड़ा अधम हूँ , इसीलिए मुरलीधर ने मुझे दर्शन नहीं दिए | अच्छा यही होगा कि मैं अपने प्राण त्याग दूँ | यह सोचकर भक्त अँधेरा होते ही अपनी कुटिया से निकल , यमुना कि ओर चल दिया | उसने निश्चय किया कि आज यमुना जी की पवित्र लहरों में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगा | इसी विचार में उलझा हुआ , वह यमुना तट की ओर जा रहा था कि एक कोढ़ी ने उसके पैर पकड़ लिये | दरअसल श्री कृष्ण ने उस कोढ़ी को सपने में यह कह दिया था कि कुछ देर बाद इधर से एक भक्त यमुना कि ओर जायगा | तू उसके पैर पकड़ लेना ओर कहना कि वह तेरा कोढ़ दूर कर दे कोढ़ी ने पैर पकड़े तो भक्त सकपका कर बोला - मुझ जैसे अभागे के पैर क्यों पकड़ते हो ? किसी साधू - महात्मा के पैर पकड़ो , तुम्हारा कल्याण होगा |

कोढ़ी गिड़गिडाकर बोला - 'मेरा कोढ़ दूर कर दो | तुम प्रभु से कह दोगे तो मेरा रोग मिट जाएगा' | भक्त मायूस होकर बोला - भाई ! अगर ऐसा ही होता तो मैं आज अपने प्राण नहीं त्याग रहा होता | मैं कई सालो से कृष्ण- बिहारी की अराधना कर रहा हूँ परन्तु आज तक उसने मुझे दर्शन तक नहीं दिये | भला मेरी और क्या बात सुनेगे ? कोढी बोला -भक्त हो, तो एक बार सच्चे मन से पुकार कर तो देखो | केवल इतना कह दो कि हे गोपाल , इस कोढी का कोढ़ दूर कर दो | फिर तुम्हे और कुछ नही करना | कोढी से पिंड छुडाने के लिये भक्त ने करुणा भरे स्वर में बांके- बिहारी को पुकारा -हे वंशीधर ! इसका कोढ़ दूर कर दो |

देखिये प्रभु का चमत्कार ! भक्त का इतना कहना था कि कोढी रोगमुक्त हो गया | देखते ही देखते उसकी काया निरोगी हो गयी | यह देखते ही भक्त चकित हो गया | उसने यमुना में कूदने का विचार त्याग दिया | अपनी कुटिया में लौटा तो उसे नींद नही आयी | सुबह होते ही वह बिहारी जी के दर्शनों को पहुंचा | उसे लगा कि मूरत उसकी ओर देखकर मुस्करा रही है | उसने हाथ जोड़ लिये | बोला - यह कैसी लीला है मुरारी ? आपने अनेक वर्षों की अराधना के बाद भी मुझें दर्शन नहीं दिया | आज मुझे कैसे निहाल कर दिया ? बाके बिहारी मुस्कराकर बोले भक्त ! तुमने मुझसे कुछ माँगा ही कहाँ जो मै तुम्हे देता ? पहली बार तुमने एक दुखी कोढ़ी को ठीक करने कि प्रार्थना की और मैंने तुम्हारी बात मान ली | भगवान् को तो भक्त की बात माननी ही पड़ती है | भक्त ख़ुशी के मारे रो पड़ा |


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Friday, April 2, 2010

" शांति की तलाश "

भगवान ने सृष्टि की रचना की | इसके बाद सृष्टि में सभी के गुजारे के लिए क्या -क्या चाहिए , वह देने का कार्य शुरू किया | किसी को आयुष्य चाहिए था तो किसी को धन -संपत्ति ,किसी को बल, किसी को विद्या | भगवान से जिसने जो माँगा , प्रभु ने कृपा कर उसे वही प्रदान किया | भगवान के पास जिसने जो देखा उसमें से सबने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार उसे मांग लिया | इस वितरण कार्य में भगवान ने किसी प्रकार की कृपणता नहीं की |

वितरण का कार्य चल ही रहा था कि भगवान के हाथ से शांति गिरकर जमीन पर आ गिरी | भगवान ने उसे अपने पैरों के नीचे दबा लिया |किसी ने भगवान के उस कार्य को नहीं देखा | लेकिन लक्ष्मी जी की नजर से यह घटना नहीं बची | सभी लोग भगवान के पास से अपनी इच्छित सामग्री लेकर चले गए | उसके बाद प्रभु ने पैर के नीचे दबी " शांति " को उठाकर अपने पास रख लिया | इस पर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा - प्रभो ! आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने उत्तर दिया - देवी ! सारे मनुष्य अपनी -अपनी इच्छित सामग्री लेकर यहाँ से चले गए हैं | अब उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं रह गयी है | उनके पास सब कुछ है लेकिन शांति नहीं है | शांति के लिए उन्हें मेरे पास आना होगा| भोग और अशांति से जब वे ऊब जायेंगे , तब उन्हें उसकी तलाश करनी होगी और वह तलाश उन्हें मेरे पास लायेगी | इसकी तलाश से ही उनका कल्याण है |

Saturday, March 27, 2010

" स्वयं को बदलने की कोशिश करो "

एक बार तुम यह जान लेते हो कि कारण तुम्ही हो , तो आधी समस्या का निदान अचानक हो जाता है, क्योंकि तब तुम उनको सहयोग नहीं दे सकते | तब तुम इतने ना समझ नहीं रहोगे कि तुम उस कारण को बढ़ावा दो जिनसे दुःख उत्पन्न होते हैं | उस कारण के साथ तुम्हारा सहयोग बंद हो जायेगा| पुरानी आदतों के कारण एक क्षण के लिए समस्याएं आयेंगी | तुम्हारे सावधान होने पर भी, एक क्षण के लिए तुम्हारी पुरानी आदतें तुम्हे उसी दिशा में जाने के लिए बाध्य करेंगी | लेकिन ऐसा अधिक दिनों तक नहीं चल सकता | अब इस काम के लिए उर्जा शेष नहीं रही | थोड़े दिनों तक इसका अवशेष रह सकता है लेकिन समय के साथ यह नष्ट हो जायगा | इस अभ्यास को हर रोज बढाने कि जरुरत है | इसे हर रोज सशक्त बनाने की जरुरत है |इसे तुम्हारे सतत सहयोग की आवश्यकता है| जब एक बार तुम सजग हो जाते हो कि अपने दुखों का कारण तुम स्वयं हो, फिर तुम इसे सहयोग देना बंद कर देते हो |

मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूँ वह सिर्फ तुम्हें एक तथ्य के प्रति सावधान करने के लिए कह रहा हूँ - तुम जहाँ हो , जैसे हो, उस सबका कारण तुम्ही हो | और यह एक बहुत ही आशा भरी बात है | यदि कारण कोई दूसरा होता तो कुछ भी नहीं किया जा सकता | यदि तुम्हीं कारण हो तो तुम इसे बदल भी सकते हो |यदि तुम नरक का निर्माण कर सकते हो तो तुम स्वर्ग का सृजन भी कर सकते | तुम अपने भाग्यविधाता स्वयं हो | अपने जीवन के लिए तुम दूसरे को जितना अधिक जिम्मेदार ठहराते हो तुम उतना ही अधिक गुलाम बन जाते हो | जब तक तुम्हारे स्वयं में परिवर्तन नहीं होगा तब तक असली परिवर्तन नहीं हो सकता | मैंने बहुत से लोगों को देखकर यह जाना है वे जो कुछ भी कर रहे हैं , उससे पूरी तरह बे खबर हैं | वे तभी सजग होते हैं, जब परिणाम सामने आता है | जब तुम एक बार जान लेते हो कि तुम्ही कारण हो तो तुम सही मार्ग पर बढ़ जाते हो | फिर बहुत सा काम आसान हो जाता है | फिर तुम अपनी जीवन की समस्याओं के निदान के लिए कुछ कर कर सकते हो | तुम स्वयं को बदल कर इसे बदल सकते हो | कोई यह कभी महसूस नहीं करता कि उसे स्वयं को बदलना है | " पूरी दुनिया को बदलना होगा लेकिन मुझे नहीं मैं सही हूँ --------- सोलह आने सही | और दुनिया गलत है क्यों कि यह मेरे अनुकूल नहीं है | सभी बुद्धों के सारे प्रयास बड़े सरल हैं | वे तुम्हें सजग बनाने के लिए हैं | कि जहां कहीं भी तुम हो, तुम जैसे हो, उसका कारण तुम्ही हो |

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Monday, March 15, 2010

" जैसा मन में भरा होगा वैसा ही जीवन मिलेगा "

भागवत पुराण के अनुसार एक राजा हुए जिनका नाम था भरत | वे बहुत ही पराक्रमी और धार्मिक राजा थे | जब उन्हें वैराग्य हुआ तो उनके मन में आया कि इस भौतिक जगत , राज्य इत्यादि में रहने से भक्ति होगी नही , अतः वन में जाना चाहिए | राज त्याग कर वे वन में चले गए | एक कुटिया बनायी और कंद - मूल खाकर रहने लगे | अच्छी दिनचर्या - केवल प्रभु का ध्यान और साधना |

जहां झोंपड़ी बनाई थी , वंही पास में जलधारा बहती थी , जिसमे जंगली जानवर अक्सर जल पीने आते थे | एक बार राजा बाहर बैठकर भगवत - चिंतन कर रहे थे कि देखा , एक हिरनी अपने बच्चे के साथ उस जलधारा में जल पी रही थी | अचानक निकट ही उन्हें शेर के दहाड़ने की आवाज सुनाई दी | शेर की दहाड़ सुनकर हिरनी घबराकर वेग से जलधारा के पार कूदी | माँ के पीछे -पीछे उसका बच्चा भी कूदा , मगर बीच में ही गिर गया और जान बचाने के लिए हाथ - पैर मारने लगा | बहुत असहाय अवस्था थी | राजा को दया आई | वे जाकर बच्चे को धरा से निकाल लाये | कहीं उसे कोई जंगली जानवर न खा जाये , इस भय से हिरन के बच्चे को अपनी झोंपड़ी में ही रख लिया| धीरे - धीरे वह बड़ा होने लगा | राजा कभी उसके लिए कोमल घास इकठ्ठा करते , तो कभी दूध की व्यवस्था करते | वे उसकी गतिविधियों में खोने लगे | जिस माया को छोड़कर वे वन में आये थे , उसने यहाँ भी उन्हें घेर लिया | अब राजा को हर समय उस हिरन के बच्चे का ही ध्यान बना रहता | कभी उसके खाने - पीने की चिंता करते तो कभी उसकी सुरक्षा की , तो कभी उसका चौकड़ी भरना निहारते रहते | जिस माया पर विजय पाने निकले थे , उसी से हार गए थे |

कृष्ण ने गीता में कहा है कि अंत काल में जो जैसा स्मरण करता है, उसे अगले जन्म में वैसी ही प्राप्ति होती है | राजा भरत का ध्यान अब हिरन में रहता था | इसलिए अंत समय आया तो उन्हें यही चिंता लगी रही कि मेरे बाद इसकी रक्षा कौन करेगा ? भागवत पुराण की कथा के अनुसार वे अगले जन्म में हिरन की ही योनि में पैदा हुए | पूर्व जन्म कि भक्ति के कारण उन्हें सब कुछ याद था, और वे अन्य हिरणों के साथ न रहकर ऋषियों की कुटियों के आस - पास ही मंडराते थे उससे अगले जनम में वे जड़ भरत के नाम से विख्यात हुए इस पूरी कथा को बताने का उद्द्देश्य यह है कि हमारे शास्त्र , हमारे ऋषि , हमारे संत जन सब एक ही बात दोहराते हैं.... click here for remaining part

Sunday, February 21, 2010

" भगवान राम और भगवान कृष्ण "

भगवान् राम का चरित्र सर्वथा अनुकरणीय है | उनकी लीला का अनुकरण करो तो भगवान मिलेंगे | भगवान कृष्ण का चरित्र चिंतनीय है | श्री कृष्ण की लीला चिंतन करने के लिए और चिंतन करके तन्मय होने के लिए है | राम ने " जो किया " वह करना है परन्तु श्री कृष्ण ने " जो कहा " वह करना है | जब तक राम नहीं आते हैं , तब तक कृष्ण भी नहीं आते हैं | भागवत में मुख्य कथा श्री कृष्ण है | फिर भी राम के आगमन के पश्चात् ही श्री कृष्ण का आगमन होता है | जिसके घर में राम नहीं आते हैं , उसके रावण रूपी काम का नाश नहीं होता और जब तक काम रूपी रावण नहीं मरता , तब तक श्री कृष्ण नहीं आते हैं | इस काम रूपी रावण को ही मारना है | आप चाहें किसी भी सम्प्रदाय के हों , जब तक आप राम की मर्यादा का पालन नहीं करेंगे , आनंद नहीं मिलेगा | मनुष्य को थोड़ा सा धन संपत्ति मिलते ही मर्यादा को भूल जाता है |

राम जी का माता -प्रेम, पिता -प्रेम, भाई - प्रेम , एक पत्नी व्रत आदि सभी कुछ जीवन में उतारने योग्य है |श्री कृष्ण जो करते थे वही सब कुछ करना क्या हमारे लिए संभव है? उन्होंने तो कालिया नाग को वश में करके उसके सिर पर नृत्य किया था | गोवर्धन पर्वत को भी उंगली पर उठा लिया था | क्या हम कर पायेगें ? श्री कृष्ण का अनुसरण करना है तो पूतना चरित्र से प्रारंभ करना है | पूतना का सारा विष उन्होंने पी लिया था | विष का पाचन होने के पश्चात् अन्य सभी लीला का अनुकरण करना है | भगवान रामचंद्र ने अपना एश्वर्य छिपाया था और मनुष्य का रूप धारण कर लीला दिखाई | साधक का आदर्श कैसा होना चाहिए वह राम जी ने बताया है | राम जी का अवतार राक्षसों की हत्या हेतु नहीं , मनुष्यों को मानव -कर्म सिखाने हेतु हुआ था | राम जी की लीला सरल है | उनकी... click here for remaining part

Wednesday, February 17, 2010

" बिनु सत्संग विवेक न होई "

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कलियुग में भवभाधाओं से छुटकारा पाने के लिए बहुत ही सरल उपाय बताया है और वह है -- नाम - जाप | उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा --

" कलियुग केवल नाम आधारा , सुमिर - सुमिर नर उतरहिं पारा | "

चूंकि इस युग में मनुष्य झंझटों में इस प्रकार फँस गया है कि उसके लिए तप , हवन , साधना ,ध्यान व् अन्य कठोर उपायों का निर्वाह करना मुश्किल हो गया है | अतः जब भी , जहां भी , जिस भी अवस्था में आप प्रभु का सुमिरन (जाप ) कर लें तो दीनबंधु - दीनानाथ , करुनानिधान - स्वामी अपने भक्तों की प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देते हैं | नाम - जाप भी यदि सत्संग के माध्यम से किया जाय तो मन लगता है | क्योंकि मन चंचल है , क्षण में इधर तो क्षण में उधर | इसकी प्रकृति ही कुछ विचित्र है | यह मोह - माया में उलझते देर नही लगाता | मनुष्य को इस कदर भरमा देता है कि वह क्या करे और क्या नही करे की स्थति में पहुँच जाता है |

एक बार भगवान् श्री कृष्ण के परम मित्र उद्धव ने भी मोह - माया से छुटकारा पाने के लिए प्रभु से अनुनय - विनय की थी | जिस समय उद्धव सखियों के प्रेम के आगे पराजित होकर प्रभु..... Click here for remaining part

Monday, January 11, 2010

बाल संत

राजा की सवारी आकर गंगा के किनारे रुकी , क्योंकि आज गुरू - पूर्णिमा होने के कारण वे गंगा स्नान के लिए आये थे|
तभी उनकी नजर एक छोटे से बालक पर पड़ी | जो दूर बैठा मिट्टी से खेलने में व्यस्त था | राजा उस बालक के पीछे आकर बैठ गए | किन्तु उसे कुछ आभास नहीं हुआ | क्योंकि वह अपने खेल में पूर्ण तन्मय था | उन्होंने ही पहल करते हुए पूछा - " तुम्हारा नाम क्या है ?
बालक - " माधो "
राजा - तुम मट्टी से क्यों खेल रहे हो ?
माधो - क्योंकि यह शरीर मट्टी से बनता है और मट्टी में मिल जाता है | इसलिए
इसी से खेल रहा हूँ |
राजा उत्तर सुनकर प्रसन्न हो गए , इसलिए उन्होंने पूछा - मेरे साथ रहोगे ?
माधो - क्यों नहीं ,मेरे लिए इससे बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती है , किन्तु मेरी कुछ
शर्तें हैं |
राजा ने मुस्कराते हुए पूछा - अपनी शर्तें बेहिचक कहो |
माधो - मैं खाऊंगा , किन्तु आप कुछ नहीं खायेंगे | मैं पहनूंगा किन्तु आप कुछ नहीं पहनेंगे|
मैं जहाँ -जहाँ जाऊंगा मेरे साथ चलेंगे | मैं जब सोऊंगा आप सदा जागकर मेरी रक्षा करेंगे |
राजा मन ही मन समझ गए कि यह बालक , बालक नहीं वरन बाल संत है | इसलिए
उन्होंने कहा कि जरा आप ही बताइए कि क्या इन शर्तों को मानना संभव है |
माधो मुस्कराते हुए बोला ,हे राजन - बिना सोचे - समझे किसी के सामने कोई प्रस्ताव नहीं रखना
चाहिए| मेरे प्रभु में उपरोक्त सभी गुण हैं , इसलिए ऐसे दयामय को छोड़कर आपके साथ कैसे रह सकता हूँ |
राजा मन ही मन उस बाल संत को नमन कर आगे बढ़ गए |

Sunday, January 10, 2010

श्री कृष्ण और घंटी

माता यशोदा श्री कृष्ण के मक्खन चुराने की शिकायतें सुन - सुनकर तंग आ गयी थीं | जब गोपियाँ उनकी शिकायत
करतीं तो माँ की ममता इस बात से इंकार कर देती | एक दिन यशोदा माँ को श्री कृष्ण की करतूतों को दिखने के लिए एक योजना सभी गोपियों ने मिलकर बनाई | उस दिन सभी ने अपने - अपने घरों में जाकर मक्खन को छत की दीवार से इतनी ऊँचाई पर टांग दिया जिससे श्री कृष्ण उसे छू भी न सकें तथा मक्खन के मटके के ऊपर ही एक घंटी लगा दी, जिससे कृष्ण रंगे हाथ पकडे जा सकें |

गोपियों की योजना के अनुसार ही हुआ | मौका पाकर श्री कृष्ण एक गोपी के घर में अपने बल - सखाओं के साथ पहुंचे | वहाँ पहुंचकर जब मक्खन की हांडी को अधिक ऊँचाई पर देखा तो सारा माजरा उनकी समझ में आ गया | उन्होंने तुरंत अपनी आँख बंद कर हाथों को जोड़ा और बड़े ही प्रेम - भाव से बोले - हे घंटी , जब तक मेरे सभी सखा मक्खन न खालें , तब तक आप मत बजना | फिर क्या था सभी ने एक - दूसरे के ऊपर चढ़कर मक्खन खाया | सभी आनंदित थे | जब सबका पेट भर गया तो श्री कृष्ण जी की बरी आयी | उन्होंने ऊपर जाकर ज्योंही मक्खन मुख में डाला घंटी जोर से टनटना उठी | सभी ग्वाल - बल वहाँ से अपनी जान बचाकर भाग निकले | बस एक कन्हैया ही मटके से लटके रह गए | गोपियाँ दौड़ कर....Click here for remaining post

करुण पुकार में है अदभुत शक्ति

उपासना का अर्थ है - परमेश्वर के पास बैठना | हम जब अपनी शुद्द भावनाओं को पूर्ण श्रद्धा के साथ अपने ईश्वर को अर्पित करते हैं तो वह उपासना कहलाती है | इस प्रकार ईश्वर का ध्यान करके एवं प्रार्थना करके हम उसके समीप हो जाते हैं| विपत्ति के छ ण में जब प्रार्थना ह्रदय से निकलती है तो हमारी प्रार्थना परमात्मा तक सीधी पहुँचती है|
उपासना शरीर, मन व् वाणी का संगम है | जब हम उपासना करते हैं तो यह तीनो अपने आराध्य देव की सेवा में एकरूप हो जाते हैं | प्रार्थना करने वाले का रोम -रोम प्रेम से पुलकित हो जाता है | जितने करुण ह्रदय से आप उपासना करेंगे , अपनी व्यथा ईश्वर से कहेंगे , उतने ही शीघ्र आपके आराध्य आपकी उपासना स्वीकार करेंगे |
आप अपने आराध्य से कहा - सुनी भी कर सकते हैं | जब उसे सब कुछ मान लिया है तो लड़ने - झगड़ने में संकोच
कैसा? इस सम्बन्ध में एक प्रसंग है|

एक उच्च कोटि के महात्मा अपने आराध्य के मंदिर में नित्य जाते थे और प्रार्थना करने के स्थान पर अपने आराध्य से कहा - सुनी करते थे तथा अपनी भाव - भंगिमाओं से अपना गुस्सा प्रदर्शित करते थे |
यही क्रम जब कई दिन तक चलता रहा तो एक दिन किसी ने उनसे पूछा , हे महाराज - आप प्रार्थना करने के स्थान पर अपने आराध्य से लड़ते क्यों हैं ? उनका यह प्रश्न सुनकर कुछ समय तक तो वे शांत रहे , फिर उनकी आखों में आंसू आ गए और उन्होंने भरे स्वर में बताया -कि मई अपने आराध्य से मिलने सैकड़ों मील दूर से पैदल चल कर आया हूँ | क्योंकि इन्होने मुझे बुलाया था और मै इनके प्यार में खिंचा चला आया | जब मै इतनी दूर से पैदल चल कर आया हूँ तो क्या ये अपने सिंघासन से उठकर मेरे पास नहीं आ सकते हैं ? इतना तो इन्हें करना चाहिए, बस मेरी इनसे यही लड़ाई है | उनका जवाब सुनकर वह प्रार्थना और प्रेम के इस नए रूप को देखकर दंग रह गये | यह तय है कि उपासना से विपत्तियाँ दूर होती हैं |

इसका कारण यह है कि प्रार्थना द्वारा हम आध्यात्मिक रक्ष| कवच धारण कर लेते हैं | इसके फलस्वरूप हमारे अन्दर आध्यात्मिक शक्ति का प्रवाह प्रवाहित होने लगता है और इसके कारण ही हमारी चिंता , रोग , शोक , व्याधि एवं कष्ट नष्ट हो जाते हैं |

Friday, January 8, 2010

' गायत्री मंत्र का भजनात्मक सरल विश्लेषण '

ॐ ही रक्षक हमारे सब गुणों की खान हैI
भू :सदा सब प्राणियो के प्राण के भी प्राण हैI
भुव :सब दुःख दूर करते दूर कृपा निधान होI
स्व: सदा सुख रूप सुखमय सतत सुख महान हो
तत वही विख्यात ब्राह्मण वेद वर्णित सार हो I

देव सा वितर सर्व उत्पादन हो पालन हार होI
शुभ वरेण्यम वरन करने योग्य भगवान् आप होI
शुभ भर्गो मल रहित निर्लेप हो निष्पाप होI
दिब्य्गुन देवस्य दिव्य स्वरुप देव अनूप होI
धीमहि धारे ह्रदय में दिब्य गुण गुनरूप होI
धियोयोनः वह हमारी बुद्धियों का हित करेI
अमर प्रचोदयात नित सन्मार्ग में प्रेरित करेI

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मानवी गरिमा की सबसे बड़ी कसौटी है -विनम्रता , निरहंकारिता

रूस के राजा एलेक्जेंडर अक्सर अपने देश की आंतरिक दशा जानने के लिए वेश बदल कर घूमने जाया करते थे | एक दिन घूमते - घूमते एक नगर में पहुंचे | वहां का रास्ता उन्हें मालूम न था | राजा रास्ता पूछने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में आगे बढे |आगे उन्होंने एक हवलदार को सरकारी वर्दी पहने हुए देखा | राजा ने उसके पास जाकर पूछा - महाशय ,अमुक स्थान पर जाने का रास्ता बता दीजिये | हवलदार ने अकड़ कर कहा -"मूर्ख ! तू देखता नहीं मै सरकारी हाकीम हूँ ,मेरा काम रास्ता बताना नहीं है | चल हट , दूसरे से पूछ |" राजा ने नम्रता से पूछा -"महोदय ,यदि सरकारी आदमी भी किसी यात्री को रास्ता बता दे , तो कुछ हर्ज थोडा ही है | खैर , मै किसी दूसरे से पूछ लूँगा| फिर इतना तो बता दीजिये , कि आप किस पद पर काम करते हैं |" हवलदार ने और भी ऐंठते हुए कहा -" अँधा है, क्या मेरी वर्दी को देखकर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ ?" एलेक्जेंडर ने कहा - शायद आप पुलिस के सिपाही हैं ," उसने कहा - नहीं उससे ऊंचा |" राजा - " तब क्या नायक हैं ?" हवलदार -" उससे भी ऊंचा |" राजा - "हवलदार हैं ?" हवलदार -"हाँ , अब तू जान गया कि मैं कौन हूँ ?" पर यह तो बता कि इतनी पूछताछ करने का तेरा क्या मतलब ? और तू कौन है ? राजा ने कहा - मै भी सरकारी आदमी हूँ | सिपाही की ऐंठ कुछ कम हुई , उसने पूछा - "क्या तुम नायक हो ? " राजा ने कहा - "नहीं , उससे ऊंचा | " हवलदार - तब क्या... Click here for remaining part

राम -नाम की महिमा

लंका में जाने के लिए समुद्र पर सेतु का निर्माण किया जा रहा था | बन्दर और भालू पत्थरों पर भगवान श्री राम का नाम लिखकर एक किनारे रहे थे | दूसरी तरफ से बन्दर और भालू आकर उन पत्थरों को समुद्र में डाल रहे थे | नल और नील के निर्देशन में बंदरों और भालूऔं का एक अलग समूह समुद्र में तैर रहे उन पत्थरों से सेतु का निर्माण कर रहा था | समुद्र में पत्थरों को तैरते देख भगवान राम के मन में कोतूहल हुआ | मेरे नाम लिखे ये पत्थर समुद्र में नहीं डूब रहे हैं| अगर मैं बिना नाम लिखे एक पत्थर को समुद्र में डाल दूँ ,तो क्या वे भी तैरेंगे ?
कोतूहलवश भगवान श्री राम आगे बढ़े | उन्होंने पत्थरों के ढेर में से एक ऐसा पत्थर उठाया , जिसपर उनका नाम नहीं लिखा गया था | भगवान ने उस पत्थर को देखा और समुद्र में फ़ेंक दिया| भगवान यह देख कर आश्चर्य में रह गए कि वह पत्थर समुद्र के जल में डूब गया |
भगवान राम के मन में बड़ा संकोच हुआ | उन्होंने सिर घुमाकर आस -पास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है| कोई नहीं दिखा तो पीछे घूम शिविर में लौटने का प्रयास करने लगे ,तभी देखा कि सामने कुछ दूरी पर हनुमान खड़ें हैं| हनुमान ने राम जी के चेहरे के भाव को पढ़ते हुए कहा ,प्रभू -आपने जिसे छोड़ दिया वह भला कैसे तैरेगा ? उसे तो डूबना ही है| सागर में वही तैर सकता है जिसे भगवान राम के नाम का सहारा मिला हो | जिसे आपके नाम का सहारा नहीं मिलेगा , वह तो सागर में डूबेगा ही | तैरने वाले पत्थरों के साथ यही विशेषता है कि उन्हें आपके नाम का सहारा मिला है| उसी सहारे की वजह से वे समुद्र में तैर रहे हैं | जिसपत्थर को आपने समुद्र में फेंका ,उसे आपके हाथ का स्पर्श तो मिला था लेकिन उसे राम -नाम का सहारा नहीं मिला था | भला सहारे के बिना कोई जल में कैसे तैर सकता है | संसार रूपी सागर में भी ऐसा ही होता है,जिस व्यक्ति को भगवान राम के नाम का सहारा है, वह बड़ी सहजता से इस संसार सागर को पार कर जाता है| जिसे राम नाम का सहारा नहीं मिलता है, वह कई जन्मों तक तरह-तरह की योनियो में भटकता रहता है|