Friday, January 8, 2010

राम -नाम की महिमा

लंका में जाने के लिए समुद्र पर सेतु का निर्माण किया जा रहा था | बन्दर और भालू पत्थरों पर भगवान श्री राम का नाम लिखकर एक किनारे रहे थे | दूसरी तरफ से बन्दर और भालू आकर उन पत्थरों को समुद्र में डाल रहे थे | नल और नील के निर्देशन में बंदरों और भालूऔं का एक अलग समूह समुद्र में तैर रहे उन पत्थरों से सेतु का निर्माण कर रहा था | समुद्र में पत्थरों को तैरते देख भगवान राम के मन में कोतूहल हुआ | मेरे नाम लिखे ये पत्थर समुद्र में नहीं डूब रहे हैं| अगर मैं बिना नाम लिखे एक पत्थर को समुद्र में डाल दूँ ,तो क्या वे भी तैरेंगे ?
कोतूहलवश भगवान श्री राम आगे बढ़े | उन्होंने पत्थरों के ढेर में से एक ऐसा पत्थर उठाया , जिसपर उनका नाम नहीं लिखा गया था | भगवान ने उस पत्थर को देखा और समुद्र में फ़ेंक दिया| भगवान यह देख कर आश्चर्य में रह गए कि वह पत्थर समुद्र के जल में डूब गया |
भगवान राम के मन में बड़ा संकोच हुआ | उन्होंने सिर घुमाकर आस -पास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है| कोई नहीं दिखा तो पीछे घूम शिविर में लौटने का प्रयास करने लगे ,तभी देखा कि सामने कुछ दूरी पर हनुमान खड़ें हैं| हनुमान ने राम जी के चेहरे के भाव को पढ़ते हुए कहा ,प्रभू -आपने जिसे छोड़ दिया वह भला कैसे तैरेगा ? उसे तो डूबना ही है| सागर में वही तैर सकता है जिसे भगवान राम के नाम का सहारा मिला हो | जिसे आपके नाम का सहारा नहीं मिलेगा , वह तो सागर में डूबेगा ही | तैरने वाले पत्थरों के साथ यही विशेषता है कि उन्हें आपके नाम का सहारा मिला है| उसी सहारे की वजह से वे समुद्र में तैर रहे हैं | जिसपत्थर को आपने समुद्र में फेंका ,उसे आपके हाथ का स्पर्श तो मिला था लेकिन उसे राम -नाम का सहारा नहीं मिला था | भला सहारे के बिना कोई जल में कैसे तैर सकता है | संसार रूपी सागर में भी ऐसा ही होता है,जिस व्यक्ति को भगवान राम के नाम का सहारा है, वह बड़ी सहजता से इस संसार सागर को पार कर जाता है| जिसे राम नाम का सहारा नहीं मिलता है, वह कई जन्मों तक तरह-तरह की योनियो में भटकता रहता है|

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