Monday, January 11, 2010

बाल संत

राजा की सवारी आकर गंगा के किनारे रुकी , क्योंकि आज गुरू - पूर्णिमा होने के कारण वे गंगा स्नान के लिए आये थे|
तभी उनकी नजर एक छोटे से बालक पर पड़ी | जो दूर बैठा मिट्टी से खेलने में व्यस्त था | राजा उस बालक के पीछे आकर बैठ गए | किन्तु उसे कुछ आभास नहीं हुआ | क्योंकि वह अपने खेल में पूर्ण तन्मय था | उन्होंने ही पहल करते हुए पूछा - " तुम्हारा नाम क्या है ?
बालक - " माधो "
राजा - तुम मट्टी से क्यों खेल रहे हो ?
माधो - क्योंकि यह शरीर मट्टी से बनता है और मट्टी में मिल जाता है | इसलिए
इसी से खेल रहा हूँ |
राजा उत्तर सुनकर प्रसन्न हो गए , इसलिए उन्होंने पूछा - मेरे साथ रहोगे ?
माधो - क्यों नहीं ,मेरे लिए इससे बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती है , किन्तु मेरी कुछ
शर्तें हैं |
राजा ने मुस्कराते हुए पूछा - अपनी शर्तें बेहिचक कहो |
माधो - मैं खाऊंगा , किन्तु आप कुछ नहीं खायेंगे | मैं पहनूंगा किन्तु आप कुछ नहीं पहनेंगे|
मैं जहाँ -जहाँ जाऊंगा मेरे साथ चलेंगे | मैं जब सोऊंगा आप सदा जागकर मेरी रक्षा करेंगे |
राजा मन ही मन समझ गए कि यह बालक , बालक नहीं वरन बाल संत है | इसलिए
उन्होंने कहा कि जरा आप ही बताइए कि क्या इन शर्तों को मानना संभव है |
माधो मुस्कराते हुए बोला ,हे राजन - बिना सोचे - समझे किसी के सामने कोई प्रस्ताव नहीं रखना
चाहिए| मेरे प्रभु में उपरोक्त सभी गुण हैं , इसलिए ऐसे दयामय को छोड़कर आपके साथ कैसे रह सकता हूँ |
राजा मन ही मन उस बाल संत को नमन कर आगे बढ़ गए |

Sunday, January 10, 2010

श्री कृष्ण और घंटी

माता यशोदा श्री कृष्ण के मक्खन चुराने की शिकायतें सुन - सुनकर तंग आ गयी थीं | जब गोपियाँ उनकी शिकायत
करतीं तो माँ की ममता इस बात से इंकार कर देती | एक दिन यशोदा माँ को श्री कृष्ण की करतूतों को दिखने के लिए एक योजना सभी गोपियों ने मिलकर बनाई | उस दिन सभी ने अपने - अपने घरों में जाकर मक्खन को छत की दीवार से इतनी ऊँचाई पर टांग दिया जिससे श्री कृष्ण उसे छू भी न सकें तथा मक्खन के मटके के ऊपर ही एक घंटी लगा दी, जिससे कृष्ण रंगे हाथ पकडे जा सकें |

गोपियों की योजना के अनुसार ही हुआ | मौका पाकर श्री कृष्ण एक गोपी के घर में अपने बल - सखाओं के साथ पहुंचे | वहाँ पहुंचकर जब मक्खन की हांडी को अधिक ऊँचाई पर देखा तो सारा माजरा उनकी समझ में आ गया | उन्होंने तुरंत अपनी आँख बंद कर हाथों को जोड़ा और बड़े ही प्रेम - भाव से बोले - हे घंटी , जब तक मेरे सभी सखा मक्खन न खालें , तब तक आप मत बजना | फिर क्या था सभी ने एक - दूसरे के ऊपर चढ़कर मक्खन खाया | सभी आनंदित थे | जब सबका पेट भर गया तो श्री कृष्ण जी की बरी आयी | उन्होंने ऊपर जाकर ज्योंही मक्खन मुख में डाला घंटी जोर से टनटना उठी | सभी ग्वाल - बल वहाँ से अपनी जान बचाकर भाग निकले | बस एक कन्हैया ही मटके से लटके रह गए | गोपियाँ दौड़ कर....Click here for remaining post

करुण पुकार में है अदभुत शक्ति

उपासना का अर्थ है - परमेश्वर के पास बैठना | हम जब अपनी शुद्द भावनाओं को पूर्ण श्रद्धा के साथ अपने ईश्वर को अर्पित करते हैं तो वह उपासना कहलाती है | इस प्रकार ईश्वर का ध्यान करके एवं प्रार्थना करके हम उसके समीप हो जाते हैं| विपत्ति के छ ण में जब प्रार्थना ह्रदय से निकलती है तो हमारी प्रार्थना परमात्मा तक सीधी पहुँचती है|
उपासना शरीर, मन व् वाणी का संगम है | जब हम उपासना करते हैं तो यह तीनो अपने आराध्य देव की सेवा में एकरूप हो जाते हैं | प्रार्थना करने वाले का रोम -रोम प्रेम से पुलकित हो जाता है | जितने करुण ह्रदय से आप उपासना करेंगे , अपनी व्यथा ईश्वर से कहेंगे , उतने ही शीघ्र आपके आराध्य आपकी उपासना स्वीकार करेंगे |
आप अपने आराध्य से कहा - सुनी भी कर सकते हैं | जब उसे सब कुछ मान लिया है तो लड़ने - झगड़ने में संकोच
कैसा? इस सम्बन्ध में एक प्रसंग है|

एक उच्च कोटि के महात्मा अपने आराध्य के मंदिर में नित्य जाते थे और प्रार्थना करने के स्थान पर अपने आराध्य से कहा - सुनी करते थे तथा अपनी भाव - भंगिमाओं से अपना गुस्सा प्रदर्शित करते थे |
यही क्रम जब कई दिन तक चलता रहा तो एक दिन किसी ने उनसे पूछा , हे महाराज - आप प्रार्थना करने के स्थान पर अपने आराध्य से लड़ते क्यों हैं ? उनका यह प्रश्न सुनकर कुछ समय तक तो वे शांत रहे , फिर उनकी आखों में आंसू आ गए और उन्होंने भरे स्वर में बताया -कि मई अपने आराध्य से मिलने सैकड़ों मील दूर से पैदल चल कर आया हूँ | क्योंकि इन्होने मुझे बुलाया था और मै इनके प्यार में खिंचा चला आया | जब मै इतनी दूर से पैदल चल कर आया हूँ तो क्या ये अपने सिंघासन से उठकर मेरे पास नहीं आ सकते हैं ? इतना तो इन्हें करना चाहिए, बस मेरी इनसे यही लड़ाई है | उनका जवाब सुनकर वह प्रार्थना और प्रेम के इस नए रूप को देखकर दंग रह गये | यह तय है कि उपासना से विपत्तियाँ दूर होती हैं |

इसका कारण यह है कि प्रार्थना द्वारा हम आध्यात्मिक रक्ष| कवच धारण कर लेते हैं | इसके फलस्वरूप हमारे अन्दर आध्यात्मिक शक्ति का प्रवाह प्रवाहित होने लगता है और इसके कारण ही हमारी चिंता , रोग , शोक , व्याधि एवं कष्ट नष्ट हो जाते हैं |

Friday, January 8, 2010

' गायत्री मंत्र का भजनात्मक सरल विश्लेषण '

ॐ ही रक्षक हमारे सब गुणों की खान हैI
भू :सदा सब प्राणियो के प्राण के भी प्राण हैI
भुव :सब दुःख दूर करते दूर कृपा निधान होI
स्व: सदा सुख रूप सुखमय सतत सुख महान हो
तत वही विख्यात ब्राह्मण वेद वर्णित सार हो I

देव सा वितर सर्व उत्पादन हो पालन हार होI
शुभ वरेण्यम वरन करने योग्य भगवान् आप होI
शुभ भर्गो मल रहित निर्लेप हो निष्पाप होI
दिब्य्गुन देवस्य दिव्य स्वरुप देव अनूप होI
धीमहि धारे ह्रदय में दिब्य गुण गुनरूप होI
धियोयोनः वह हमारी बुद्धियों का हित करेI
अमर प्रचोदयात नित सन्मार्ग में प्रेरित करेI

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मानवी गरिमा की सबसे बड़ी कसौटी है -विनम्रता , निरहंकारिता

रूस के राजा एलेक्जेंडर अक्सर अपने देश की आंतरिक दशा जानने के लिए वेश बदल कर घूमने जाया करते थे | एक दिन घूमते - घूमते एक नगर में पहुंचे | वहां का रास्ता उन्हें मालूम न था | राजा रास्ता पूछने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में आगे बढे |आगे उन्होंने एक हवलदार को सरकारी वर्दी पहने हुए देखा | राजा ने उसके पास जाकर पूछा - महाशय ,अमुक स्थान पर जाने का रास्ता बता दीजिये | हवलदार ने अकड़ कर कहा -"मूर्ख ! तू देखता नहीं मै सरकारी हाकीम हूँ ,मेरा काम रास्ता बताना नहीं है | चल हट , दूसरे से पूछ |" राजा ने नम्रता से पूछा -"महोदय ,यदि सरकारी आदमी भी किसी यात्री को रास्ता बता दे , तो कुछ हर्ज थोडा ही है | खैर , मै किसी दूसरे से पूछ लूँगा| फिर इतना तो बता दीजिये , कि आप किस पद पर काम करते हैं |" हवलदार ने और भी ऐंठते हुए कहा -" अँधा है, क्या मेरी वर्दी को देखकर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ ?" एलेक्जेंडर ने कहा - शायद आप पुलिस के सिपाही हैं ," उसने कहा - नहीं उससे ऊंचा |" राजा - " तब क्या नायक हैं ?" हवलदार -" उससे भी ऊंचा |" राजा - "हवलदार हैं ?" हवलदार -"हाँ , अब तू जान गया कि मैं कौन हूँ ?" पर यह तो बता कि इतनी पूछताछ करने का तेरा क्या मतलब ? और तू कौन है ? राजा ने कहा - मै भी सरकारी आदमी हूँ | सिपाही की ऐंठ कुछ कम हुई , उसने पूछा - "क्या तुम नायक हो ? " राजा ने कहा - "नहीं , उससे ऊंचा | " हवलदार - तब क्या... Click here for remaining part

राम -नाम की महिमा

लंका में जाने के लिए समुद्र पर सेतु का निर्माण किया जा रहा था | बन्दर और भालू पत्थरों पर भगवान श्री राम का नाम लिखकर एक किनारे रहे थे | दूसरी तरफ से बन्दर और भालू आकर उन पत्थरों को समुद्र में डाल रहे थे | नल और नील के निर्देशन में बंदरों और भालूऔं का एक अलग समूह समुद्र में तैर रहे उन पत्थरों से सेतु का निर्माण कर रहा था | समुद्र में पत्थरों को तैरते देख भगवान राम के मन में कोतूहल हुआ | मेरे नाम लिखे ये पत्थर समुद्र में नहीं डूब रहे हैं| अगर मैं बिना नाम लिखे एक पत्थर को समुद्र में डाल दूँ ,तो क्या वे भी तैरेंगे ?
कोतूहलवश भगवान श्री राम आगे बढ़े | उन्होंने पत्थरों के ढेर में से एक ऐसा पत्थर उठाया , जिसपर उनका नाम नहीं लिखा गया था | भगवान ने उस पत्थर को देखा और समुद्र में फ़ेंक दिया| भगवान यह देख कर आश्चर्य में रह गए कि वह पत्थर समुद्र के जल में डूब गया |
भगवान राम के मन में बड़ा संकोच हुआ | उन्होंने सिर घुमाकर आस -पास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है| कोई नहीं दिखा तो पीछे घूम शिविर में लौटने का प्रयास करने लगे ,तभी देखा कि सामने कुछ दूरी पर हनुमान खड़ें हैं| हनुमान ने राम जी के चेहरे के भाव को पढ़ते हुए कहा ,प्रभू -आपने जिसे छोड़ दिया वह भला कैसे तैरेगा ? उसे तो डूबना ही है| सागर में वही तैर सकता है जिसे भगवान राम के नाम का सहारा मिला हो | जिसे आपके नाम का सहारा नहीं मिलेगा , वह तो सागर में डूबेगा ही | तैरने वाले पत्थरों के साथ यही विशेषता है कि उन्हें आपके नाम का सहारा मिला है| उसी सहारे की वजह से वे समुद्र में तैर रहे हैं | जिसपत्थर को आपने समुद्र में फेंका ,उसे आपके हाथ का स्पर्श तो मिला था लेकिन उसे राम -नाम का सहारा नहीं मिला था | भला सहारे के बिना कोई जल में कैसे तैर सकता है | संसार रूपी सागर में भी ऐसा ही होता है,जिस व्यक्ति को भगवान राम के नाम का सहारा है, वह बड़ी सहजता से इस संसार सागर को पार कर जाता है| जिसे राम नाम का सहारा नहीं मिलता है, वह कई जन्मों तक तरह-तरह की योनियो में भटकता रहता है|