Sunday, February 21, 2010

" भगवान राम और भगवान कृष्ण "

भगवान् राम का चरित्र सर्वथा अनुकरणीय है | उनकी लीला का अनुकरण करो तो भगवान मिलेंगे | भगवान कृष्ण का चरित्र चिंतनीय है | श्री कृष्ण की लीला चिंतन करने के लिए और चिंतन करके तन्मय होने के लिए है | राम ने " जो किया " वह करना है परन्तु श्री कृष्ण ने " जो कहा " वह करना है | जब तक राम नहीं आते हैं , तब तक कृष्ण भी नहीं आते हैं | भागवत में मुख्य कथा श्री कृष्ण है | फिर भी राम के आगमन के पश्चात् ही श्री कृष्ण का आगमन होता है | जिसके घर में राम नहीं आते हैं , उसके रावण रूपी काम का नाश नहीं होता और जब तक काम रूपी रावण नहीं मरता , तब तक श्री कृष्ण नहीं आते हैं | इस काम रूपी रावण को ही मारना है | आप चाहें किसी भी सम्प्रदाय के हों , जब तक आप राम की मर्यादा का पालन नहीं करेंगे , आनंद नहीं मिलेगा | मनुष्य को थोड़ा सा धन संपत्ति मिलते ही मर्यादा को भूल जाता है |

राम जी का माता -प्रेम, पिता -प्रेम, भाई - प्रेम , एक पत्नी व्रत आदि सभी कुछ जीवन में उतारने योग्य है |श्री कृष्ण जो करते थे वही सब कुछ करना क्या हमारे लिए संभव है? उन्होंने तो कालिया नाग को वश में करके उसके सिर पर नृत्य किया था | गोवर्धन पर्वत को भी उंगली पर उठा लिया था | क्या हम कर पायेगें ? श्री कृष्ण का अनुसरण करना है तो पूतना चरित्र से प्रारंभ करना है | पूतना का सारा विष उन्होंने पी लिया था | विष का पाचन होने के पश्चात् अन्य सभी लीला का अनुकरण करना है | भगवान रामचंद्र ने अपना एश्वर्य छिपाया था और मनुष्य का रूप धारण कर लीला दिखाई | साधक का आदर्श कैसा होना चाहिए वह राम जी ने बताया है | राम जी का अवतार राक्षसों की हत्या हेतु नहीं , मनुष्यों को मानव -कर्म सिखाने हेतु हुआ था | राम जी की लीला सरल है | उनकी... click here for remaining part

Wednesday, February 17, 2010

" बिनु सत्संग विवेक न होई "

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कलियुग में भवभाधाओं से छुटकारा पाने के लिए बहुत ही सरल उपाय बताया है और वह है -- नाम - जाप | उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा --

" कलियुग केवल नाम आधारा , सुमिर - सुमिर नर उतरहिं पारा | "

चूंकि इस युग में मनुष्य झंझटों में इस प्रकार फँस गया है कि उसके लिए तप , हवन , साधना ,ध्यान व् अन्य कठोर उपायों का निर्वाह करना मुश्किल हो गया है | अतः जब भी , जहां भी , जिस भी अवस्था में आप प्रभु का सुमिरन (जाप ) कर लें तो दीनबंधु - दीनानाथ , करुनानिधान - स्वामी अपने भक्तों की प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देते हैं | नाम - जाप भी यदि सत्संग के माध्यम से किया जाय तो मन लगता है | क्योंकि मन चंचल है , क्षण में इधर तो क्षण में उधर | इसकी प्रकृति ही कुछ विचित्र है | यह मोह - माया में उलझते देर नही लगाता | मनुष्य को इस कदर भरमा देता है कि वह क्या करे और क्या नही करे की स्थति में पहुँच जाता है |

एक बार भगवान् श्री कृष्ण के परम मित्र उद्धव ने भी मोह - माया से छुटकारा पाने के लिए प्रभु से अनुनय - विनय की थी | जिस समय उद्धव सखियों के प्रेम के आगे पराजित होकर प्रभु..... Click here for remaining part