दुनिया सुखो के पीछे दौड़ रही है| हर कोई सब कुछ पाने की होड़ में लगा है| हम खुद भी ऐसे हैं और बच्चों को भी इसी दौड़ में जुटा दिया है| हर सुख, सारी सुविधा और दुनिया भर का वैभव हर एक की दिली तमन्ना हो गयी है| एक चीज़ का अभाव भी बर्दाशत नहीं है| थोड़ी सी असफलता हमें तोड़ देती है| लेकिन इसके बाद भी जो नहीं मिल पा रहा है वो है आनंद| दरअसल यह आनंद सब कुछ पा लेने में नहीं है| कभी – कभी अभाव में जीना भी आनंद देने लगता है|
अगर आपके अन्दर कोई अभाव है तो उसे सद्गुणों से भरने का प्रयास करें| महत्वाकांक्षाओं को हावी न होने दे| मन चाहा मिल जाए इसके लिये तेज़ी से दौड़ रही है दुनिया| न मिलने का विचार तो लोगो को भीतर तक हिला देता है| संतों ने बार – बार कहा है जो है उसका उपयोग करो और जो नहीं है उसके बारे में सोच – सोच कर तनाव में मत आओ| हम जो नहीं हैं उसे हानि मन कर जो है उसका भी लाभ नहीं उठा पाते हैं| संतो के पास यह कला होती है की वह अभाव का भी आनंद उठा लेते हैं| हमारे लिये दो उदहारण काफी हैं| श्री राम वनवास में पूरी तरह से अभाव में थे| जिनका कल राजतिलक होने वाला था उन्हें चौदह वर्ष वनवास जाना पड़ा| इधर रावण के पास ऐसी सत्ता थी जिसे देख देवता भी नतमस्तक थे| एक के पास सब कुछ था फिर भी वहा हार गया और दुसरे ने पूर्ण अभाव में भी दुनिया जीत ली| अभाव हमें संघर्ष के लिये प्रेरित करे, कुछ पाने के लिये प्रोत्साहित करे यहाँ तक तो ठीक है परन्तु हम अभाव में बैचेन हो जाते हैं और परेशान, तनावग्रस्त मन लेकर कुछ पाने के लिये दौड़ पड़ते हैं| तब क्रोध, हिंसा, भ्रष्ट आचरण हमारे भीतर कब उतर जाते हैं पता ही नहीं चल पाता है| इसे एक और दृष्टि से देख सकते हैं| रावन में भक्ति का अभाव था, बाकी सब कुछ था उसके पास| कई लोगो के साथ ऐसा होता है| आदमी अपने अन्दर के अभाव को भरने की कोशिश भी करता है| रावन ने भक्ति के अभाव को अपने अहंकार से भरा था, आज भी कई लोग अपनी महत्वकांक्षी विकृतियों, दुर्गणों से भरने लगते हैं| जिन्हें भक्ति करना हो वें समझ ले पहली बात अभाव का आनंद उठाना सीखें और अभाव को भरने के लिये लक्ष्य, उद्देश्य पवित्र रखें|
Monday, April 18, 2011
Tuesday, March 8, 2011
' नब्बे नहीं पूरे सौ चाहिए '
हम में से अधिकतर लोगों के साथ यही समस्या है | जेब में नब्बे रूपये हैं, तो उसका फायदा नहीं उठाएंगे | बस इसी प्रयास में लगे रहेंगे कि दस रूपये और मिल जाँय और पूरे सौ हो जाए | नब्बे रूपये का सुख नहीं भोगेंगे | दस रूपये का दुःख भोगेंगे | हम कभी अपने से छोटों को देखकर नहीं जीते हैं | हम सभी कम्पटीशन में जी रहें हैं, इसीलिए दुखी हैं | अगर पडौसी के घर में कार हो और हमारे घर में नहीं तो यह हमारे लिए सीधी चुनौती हो जाती है | इसलिए, जीवन में इतने दुःख , इतना संघर्ष और इतनी पीडाएं हैं | क्योंकि जीवन में केवल वही सुखी है जो दुःख में भी सुख खोजकर जीना जानता है|
एक बार की बात है - एक महात्मा के पास एक आदमी और उसकी पत्नी पहुंचे | बड़े परेशान, से और बुझे -बुझे से लग रहे थे | महात्मा जी ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पुछा तो वे बोले मैं बहुत परेशान हूँ | मुझे बिजनेस में एक लाख का घाटा हुआ है | मन बड़ा बैचैन हो गया है | उसके पीछे उसकी पत्नी बैठी थी | वह धीरे से, मुस्करायी और बोली महाराज मेरे पति झूठ बोल रहे हैं | इनकी बातों में मत आना, इन्हें कोई घाटा नही हुआ | महात्मा ने कहा आखिर सच्चाई क्या है | तुम कहते हो घाटा , पत्नी कहती है कोई घाटा नही , सही क्या है ? वह आदमी बोला , मेरी पत्नी नही समझती , मुझे पूरे एक लाख का नुक्सान हुआ है | उसकी पत्नी बोली ये तो झूठ है एकदम सफेद झूठ | महात्मा ने उसकी पत्नी से कहा सच कहो आखिर बात क्या है ? उसकी पत्नी बोली दरअसल बात यह है कि इन्होने जो, सौदा किया था , उसमे इन्हें इनके गणित के हिसाब से दो लाख का फायदा होना चाहिए था , लेकिन इन्हें एक लाख का ही फायदा हुआ है | इसलिए दुखीं हैं | पत्नी सुखी है क्योंकि वह एक लाख के फायदे को देख रही है | पत्नी ने दुःख में से, सुख को खोज लिया है | पति दुखी है क्योंकि वह जो खो गया है , उसमे ही जी रहा है | जो मिल गया है उसके महत्त्व को नही समझ रहा है | जो मिला है उसका आनंद नही उठा रहा है | बल्कि जो नही मिला है उसका दुःख उठा रहा है | महात्मा, ने उससे कहा दुनिया की कोई चीज तुम्हे सुखी नही कर सकती क्योंकि तुम अपने लिए नही जी रहे, तुम दुनिया को दिखने के लिए जी रहे हो | दुनिया के लिए जीने वाला कभी सुखी नही रह सकता | इसलिए तुम बिना कारण ही दुखी हो, मई तो क्या कोई भी तुम्हारी इस समस्या का हल नही बता सकता , जब तक तुम नही चाहते तुम्हे कोई भी सुख सुखी नही कर सकता |
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एक बार की बात है - एक महात्मा के पास एक आदमी और उसकी पत्नी पहुंचे | बड़े परेशान, से और बुझे -बुझे से लग रहे थे | महात्मा जी ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पुछा तो वे बोले मैं बहुत परेशान हूँ | मुझे बिजनेस में एक लाख का घाटा हुआ है | मन बड़ा बैचैन हो गया है | उसके पीछे उसकी पत्नी बैठी थी | वह धीरे से, मुस्करायी और बोली महाराज मेरे पति झूठ बोल रहे हैं | इनकी बातों में मत आना, इन्हें कोई घाटा नही हुआ | महात्मा ने कहा आखिर सच्चाई क्या है | तुम कहते हो घाटा , पत्नी कहती है कोई घाटा नही , सही क्या है ? वह आदमी बोला , मेरी पत्नी नही समझती , मुझे पूरे एक लाख का नुक्सान हुआ है | उसकी पत्नी बोली ये तो झूठ है एकदम सफेद झूठ | महात्मा ने उसकी पत्नी से कहा सच कहो आखिर बात क्या है ? उसकी पत्नी बोली दरअसल बात यह है कि इन्होने जो, सौदा किया था , उसमे इन्हें इनके गणित के हिसाब से दो लाख का फायदा होना चाहिए था , लेकिन इन्हें एक लाख का ही फायदा हुआ है | इसलिए दुखीं हैं | पत्नी सुखी है क्योंकि वह एक लाख के फायदे को देख रही है | पत्नी ने दुःख में से, सुख को खोज लिया है | पति दुखी है क्योंकि वह जो खो गया है , उसमे ही जी रहा है | जो मिल गया है उसके महत्त्व को नही समझ रहा है | जो मिला है उसका आनंद नही उठा रहा है | बल्कि जो नही मिला है उसका दुःख उठा रहा है | महात्मा, ने उससे कहा दुनिया की कोई चीज तुम्हे सुखी नही कर सकती क्योंकि तुम अपने लिए नही जी रहे, तुम दुनिया को दिखने के लिए जी रहे हो | दुनिया के लिए जीने वाला कभी सुखी नही रह सकता | इसलिए तुम बिना कारण ही दुखी हो, मई तो क्या कोई भी तुम्हारी इस समस्या का हल नही बता सकता , जब तक तुम नही चाहते तुम्हे कोई भी सुख सुखी नही कर सकता |
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Thursday, September 30, 2010
प्रशंसा
"आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते है और हम अन्दर की ओर| बताइए इन दोनों में से कौन का तरीका श्रेष्ट है ? " पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीदुद्दीन से पूछा|
फकीर ने बड़ी बुद्धिमतापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया - "महाराज | मुस्लमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकलने का प्रयास करते है, जबकि हिन्दू अन्दर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते है | "
प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की|
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फकीर ने बड़ी बुद्धिमतापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया - "महाराज | मुस्लमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकलने का प्रयास करते है, जबकि हिन्दू अन्दर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते है | "
प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की|
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Wednesday, June 30, 2010
" सबसे बड़ा मुर्ख "
इन्सान को अंत तक बोध नहीं हो पाता की क्यों वे इस धरती में जन्मे है व क्या उन्हें करना है ? मखौल में ही जिंदगी काट देते है | एक साधू तीर्थ यात्रा पर निकले | मार्ग - व्यय के लिए किसी सेठ से कुछ माँगा , तो उसने कुछ दिया तो नहीं , पर अपना एक काम भी सौप दिया |
एक बड़ा दर्पण हाथ में थमाते हुए कहा - " प्रवास काल में जो सबसे बड़ा मुर्ख आपको मिले उसे दे देना | " संत बिना रुष्ट हुए उसका काम कर देने का वचन देकर दर्पण साथ में ले गए | बहुत दिन बाद वापस लौटे, तो सेठ को बीमार पड़े पाए | संगृहीत धन से वे न अपना इलाज करा पाए और न किसी सत्कर्म में लगा पाए | मरनासन स्तिथि में सम्बन्धी , कुटुम्बी उसका धन , माल उठा - उठाकर ले जा रहे थे | सेठजी को मृत्यु और लूट का दुहरा कष्ट हो रहा था | साधू ने सारी स्तिथि समझी और दर्पण उन्ही को वापिस लौटा दिया | कहा - " आप ही इस बीच सबसे बड़े मुर्ख मिले , जिसने कमाया तो बहुत , पर सदुपयोग करने का विचार तक नहीं उठा | " http://www.manmanthan.com
एक बड़ा दर्पण हाथ में थमाते हुए कहा - " प्रवास काल में जो सबसे बड़ा मुर्ख आपको मिले उसे दे देना | " संत बिना रुष्ट हुए उसका काम कर देने का वचन देकर दर्पण साथ में ले गए | बहुत दिन बाद वापस लौटे, तो सेठ को बीमार पड़े पाए | संगृहीत धन से वे न अपना इलाज करा पाए और न किसी सत्कर्म में लगा पाए | मरनासन स्तिथि में सम्बन्धी , कुटुम्बी उसका धन , माल उठा - उठाकर ले जा रहे थे | सेठजी को मृत्यु और लूट का दुहरा कष्ट हो रहा था | साधू ने सारी स्तिथि समझी और दर्पण उन्ही को वापिस लौटा दिया | कहा - " आप ही इस बीच सबसे बड़े मुर्ख मिले , जिसने कमाया तो बहुत , पर सदुपयोग करने का विचार तक नहीं उठा | " http://www.manmanthan.com
Tuesday, May 4, 2010
"प्रार्थना की शक्ति"
भगवान् श्री कृष्ण का एक अनन्य भक्त था | वह बृन्दावन में प्रभु की उपासना में लीन रहता था | घंटो प्रभु के अलौकिक रूप को निहारता , परन्तु गिरधर ने उसे कभी भी दर्शन नही दिए | एक दिन भक्त हताश होकर चिल्लाने लगा - मै बड़ा अधम हूँ , इसीलिए मुरलीधर ने मुझे दर्शन नहीं दिए | अच्छा यही होगा कि मैं अपने प्राण त्याग दूँ | यह सोचकर भक्त अँधेरा होते ही अपनी कुटिया से निकल , यमुना कि ओर चल दिया | उसने निश्चय किया कि आज यमुना जी की पवित्र लहरों में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगा | इसी विचार में उलझा हुआ , वह यमुना तट की ओर जा रहा था कि एक कोढ़ी ने उसके पैर पकड़ लिये | दरअसल श्री कृष्ण ने उस कोढ़ी को सपने में यह कह दिया था कि कुछ देर बाद इधर से एक भक्त यमुना कि ओर जायगा | तू उसके पैर पकड़ लेना ओर कहना कि वह तेरा कोढ़ दूर कर दे कोढ़ी ने पैर पकड़े तो भक्त सकपका कर बोला - मुझ जैसे अभागे के पैर क्यों पकड़ते हो ? किसी साधू - महात्मा के पैर पकड़ो , तुम्हारा कल्याण होगा |
कोढ़ी गिड़गिडाकर बोला - 'मेरा कोढ़ दूर कर दो | तुम प्रभु से कह दोगे तो मेरा रोग मिट जाएगा' | भक्त मायूस होकर बोला - भाई ! अगर ऐसा ही होता तो मैं आज अपने प्राण नहीं त्याग रहा होता | मैं कई सालो से कृष्ण- बिहारी की अराधना कर रहा हूँ परन्तु आज तक उसने मुझे दर्शन तक नहीं दिये | भला मेरी और क्या बात सुनेगे ? कोढी बोला -भक्त हो, तो एक बार सच्चे मन से पुकार कर तो देखो | केवल इतना कह दो कि हे गोपाल , इस कोढी का कोढ़ दूर कर दो | फिर तुम्हे और कुछ नही करना | कोढी से पिंड छुडाने के लिये भक्त ने करुणा भरे स्वर में बांके- बिहारी को पुकारा -हे वंशीधर ! इसका कोढ़ दूर कर दो |
देखिये प्रभु का चमत्कार ! भक्त का इतना कहना था कि कोढी रोगमुक्त हो गया | देखते ही देखते उसकी काया निरोगी हो गयी | यह देखते ही भक्त चकित हो गया | उसने यमुना में कूदने का विचार त्याग दिया | अपनी कुटिया में लौटा तो उसे नींद नही आयी | सुबह होते ही वह बिहारी जी के दर्शनों को पहुंचा | उसे लगा कि मूरत उसकी ओर देखकर मुस्करा रही है | उसने हाथ जोड़ लिये | बोला - यह कैसी लीला है मुरारी ? आपने अनेक वर्षों की अराधना के बाद भी मुझें दर्शन नहीं दिया | आज मुझे कैसे निहाल कर दिया ? बाके बिहारी मुस्कराकर बोले भक्त ! तुमने मुझसे कुछ माँगा ही कहाँ जो मै तुम्हे देता ? पहली बार तुमने एक दुखी कोढ़ी को ठीक करने कि प्रार्थना की और मैंने तुम्हारी बात मान ली | भगवान् को तो भक्त की बात माननी ही पड़ती है | भक्त ख़ुशी के मारे रो पड़ा |
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कोढ़ी गिड़गिडाकर बोला - 'मेरा कोढ़ दूर कर दो | तुम प्रभु से कह दोगे तो मेरा रोग मिट जाएगा' | भक्त मायूस होकर बोला - भाई ! अगर ऐसा ही होता तो मैं आज अपने प्राण नहीं त्याग रहा होता | मैं कई सालो से कृष्ण- बिहारी की अराधना कर रहा हूँ परन्तु आज तक उसने मुझे दर्शन तक नहीं दिये | भला मेरी और क्या बात सुनेगे ? कोढी बोला -भक्त हो, तो एक बार सच्चे मन से पुकार कर तो देखो | केवल इतना कह दो कि हे गोपाल , इस कोढी का कोढ़ दूर कर दो | फिर तुम्हे और कुछ नही करना | कोढी से पिंड छुडाने के लिये भक्त ने करुणा भरे स्वर में बांके- बिहारी को पुकारा -हे वंशीधर ! इसका कोढ़ दूर कर दो |
देखिये प्रभु का चमत्कार ! भक्त का इतना कहना था कि कोढी रोगमुक्त हो गया | देखते ही देखते उसकी काया निरोगी हो गयी | यह देखते ही भक्त चकित हो गया | उसने यमुना में कूदने का विचार त्याग दिया | अपनी कुटिया में लौटा तो उसे नींद नही आयी | सुबह होते ही वह बिहारी जी के दर्शनों को पहुंचा | उसे लगा कि मूरत उसकी ओर देखकर मुस्करा रही है | उसने हाथ जोड़ लिये | बोला - यह कैसी लीला है मुरारी ? आपने अनेक वर्षों की अराधना के बाद भी मुझें दर्शन नहीं दिया | आज मुझे कैसे निहाल कर दिया ? बाके बिहारी मुस्कराकर बोले भक्त ! तुमने मुझसे कुछ माँगा ही कहाँ जो मै तुम्हे देता ? पहली बार तुमने एक दुखी कोढ़ी को ठीक करने कि प्रार्थना की और मैंने तुम्हारी बात मान ली | भगवान् को तो भक्त की बात माननी ही पड़ती है | भक्त ख़ुशी के मारे रो पड़ा |
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Friday, April 2, 2010
" शांति की तलाश "
भगवान ने सृष्टि की रचना की | इसके बाद सृष्टि में सभी के गुजारे के लिए क्या -क्या चाहिए , वह देने का कार्य शुरू किया | किसी को आयुष्य चाहिए था तो किसी को धन -संपत्ति ,किसी को बल, किसी को विद्या | भगवान से जिसने जो माँगा , प्रभु ने कृपा कर उसे वही प्रदान किया | भगवान के पास जिसने जो देखा उसमें से सबने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार उसे मांग लिया | इस वितरण कार्य में भगवान ने किसी प्रकार की कृपणता नहीं की |
वितरण का कार्य चल ही रहा था कि भगवान के हाथ से शांति गिरकर जमीन पर आ गिरी | भगवान ने उसे अपने पैरों के नीचे दबा लिया |किसी ने भगवान के उस कार्य को नहीं देखा | लेकिन लक्ष्मी जी की नजर से यह घटना नहीं बची | सभी लोग भगवान के पास से अपनी इच्छित सामग्री लेकर चले गए | उसके बाद प्रभु ने पैर के नीचे दबी " शांति " को उठाकर अपने पास रख लिया | इस पर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा - प्रभो ! आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने उत्तर दिया - देवी ! सारे मनुष्य अपनी -अपनी इच्छित सामग्री लेकर यहाँ से चले गए हैं | अब उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं रह गयी है | उनके पास सब कुछ है लेकिन शांति नहीं है | शांति के लिए उन्हें मेरे पास आना होगा| भोग और अशांति से जब वे ऊब जायेंगे , तब उन्हें उसकी तलाश करनी होगी और वह तलाश उन्हें मेरे पास लायेगी | इसकी तलाश से ही उनका कल्याण है |
वितरण का कार्य चल ही रहा था कि भगवान के हाथ से शांति गिरकर जमीन पर आ गिरी | भगवान ने उसे अपने पैरों के नीचे दबा लिया |किसी ने भगवान के उस कार्य को नहीं देखा | लेकिन लक्ष्मी जी की नजर से यह घटना नहीं बची | सभी लोग भगवान के पास से अपनी इच्छित सामग्री लेकर चले गए | उसके बाद प्रभु ने पैर के नीचे दबी " शांति " को उठाकर अपने पास रख लिया | इस पर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा - प्रभो ! आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने उत्तर दिया - देवी ! सारे मनुष्य अपनी -अपनी इच्छित सामग्री लेकर यहाँ से चले गए हैं | अब उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं रह गयी है | उनके पास सब कुछ है लेकिन शांति नहीं है | शांति के लिए उन्हें मेरे पास आना होगा| भोग और अशांति से जब वे ऊब जायेंगे , तब उन्हें उसकी तलाश करनी होगी और वह तलाश उन्हें मेरे पास लायेगी | इसकी तलाश से ही उनका कल्याण है |
Saturday, March 27, 2010
" स्वयं को बदलने की कोशिश करो "
एक बार तुम यह जान लेते हो कि कारण तुम्ही हो , तो आधी समस्या का निदान अचानक हो जाता है, क्योंकि तब तुम उनको सहयोग नहीं दे सकते | तब तुम इतने ना समझ नहीं रहोगे कि तुम उस कारण को बढ़ावा दो जिनसे दुःख उत्पन्न होते हैं | उस कारण के साथ तुम्हारा सहयोग बंद हो जायेगा| पुरानी आदतों के कारण एक क्षण के लिए समस्याएं आयेंगी | तुम्हारे सावधान होने पर भी, एक क्षण के लिए तुम्हारी पुरानी आदतें तुम्हे उसी दिशा में जाने के लिए बाध्य करेंगी | लेकिन ऐसा अधिक दिनों तक नहीं चल सकता | अब इस काम के लिए उर्जा शेष नहीं रही | थोड़े दिनों तक इसका अवशेष रह सकता है लेकिन समय के साथ यह नष्ट हो जायगा | इस अभ्यास को हर रोज बढाने कि जरुरत है | इसे हर रोज सशक्त बनाने की जरुरत है |इसे तुम्हारे सतत सहयोग की आवश्यकता है| जब एक बार तुम सजग हो जाते हो कि अपने दुखों का कारण तुम स्वयं हो, फिर तुम इसे सहयोग देना बंद कर देते हो |
मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूँ वह सिर्फ तुम्हें एक तथ्य के प्रति सावधान करने के लिए कह रहा हूँ - तुम जहाँ हो , जैसे हो, उस सबका कारण तुम्ही हो | और यह एक बहुत ही आशा भरी बात है | यदि कारण कोई दूसरा होता तो कुछ भी नहीं किया जा सकता | यदि तुम्हीं कारण हो तो तुम इसे बदल भी सकते हो |यदि तुम नरक का निर्माण कर सकते हो तो तुम स्वर्ग का सृजन भी कर सकते | तुम अपने भाग्यविधाता स्वयं हो | अपने जीवन के लिए तुम दूसरे को जितना अधिक जिम्मेदार ठहराते हो तुम उतना ही अधिक गुलाम बन जाते हो | जब तक तुम्हारे स्वयं में परिवर्तन नहीं होगा तब तक असली परिवर्तन नहीं हो सकता | मैंने बहुत से लोगों को देखकर यह जाना है वे जो कुछ भी कर रहे हैं , उससे पूरी तरह बे खबर हैं | वे तभी सजग होते हैं, जब परिणाम सामने आता है | जब तुम एक बार जान लेते हो कि तुम्ही कारण हो तो तुम सही मार्ग पर बढ़ जाते हो | फिर बहुत सा काम आसान हो जाता है | फिर तुम अपनी जीवन की समस्याओं के निदान के लिए कुछ कर कर सकते हो | तुम स्वयं को बदल कर इसे बदल सकते हो | कोई यह कभी महसूस नहीं करता कि उसे स्वयं को बदलना है | " पूरी दुनिया को बदलना होगा लेकिन मुझे नहीं मैं सही हूँ --------- सोलह आने सही | और दुनिया गलत है क्यों कि यह मेरे अनुकूल नहीं है | सभी बुद्धों के सारे प्रयास बड़े सरल हैं | वे तुम्हें सजग बनाने के लिए हैं | कि जहां कहीं भी तुम हो, तुम जैसे हो, उसका कारण तुम्ही हो |
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मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूँ वह सिर्फ तुम्हें एक तथ्य के प्रति सावधान करने के लिए कह रहा हूँ - तुम जहाँ हो , जैसे हो, उस सबका कारण तुम्ही हो | और यह एक बहुत ही आशा भरी बात है | यदि कारण कोई दूसरा होता तो कुछ भी नहीं किया जा सकता | यदि तुम्हीं कारण हो तो तुम इसे बदल भी सकते हो |यदि तुम नरक का निर्माण कर सकते हो तो तुम स्वर्ग का सृजन भी कर सकते | तुम अपने भाग्यविधाता स्वयं हो | अपने जीवन के लिए तुम दूसरे को जितना अधिक जिम्मेदार ठहराते हो तुम उतना ही अधिक गुलाम बन जाते हो | जब तक तुम्हारे स्वयं में परिवर्तन नहीं होगा तब तक असली परिवर्तन नहीं हो सकता | मैंने बहुत से लोगों को देखकर यह जाना है वे जो कुछ भी कर रहे हैं , उससे पूरी तरह बे खबर हैं | वे तभी सजग होते हैं, जब परिणाम सामने आता है | जब तुम एक बार जान लेते हो कि तुम्ही कारण हो तो तुम सही मार्ग पर बढ़ जाते हो | फिर बहुत सा काम आसान हो जाता है | फिर तुम अपनी जीवन की समस्याओं के निदान के लिए कुछ कर कर सकते हो | तुम स्वयं को बदल कर इसे बदल सकते हो | कोई यह कभी महसूस नहीं करता कि उसे स्वयं को बदलना है | " पूरी दुनिया को बदलना होगा लेकिन मुझे नहीं मैं सही हूँ --------- सोलह आने सही | और दुनिया गलत है क्यों कि यह मेरे अनुकूल नहीं है | सभी बुद्धों के सारे प्रयास बड़े सरल हैं | वे तुम्हें सजग बनाने के लिए हैं | कि जहां कहीं भी तुम हो, तुम जैसे हो, उसका कारण तुम्ही हो |
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