Friday, April 2, 2010

" शांति की तलाश "

भगवान ने सृष्टि की रचना की | इसके बाद सृष्टि में सभी के गुजारे के लिए क्या -क्या चाहिए , वह देने का कार्य शुरू किया | किसी को आयुष्य चाहिए था तो किसी को धन -संपत्ति ,किसी को बल, किसी को विद्या | भगवान से जिसने जो माँगा , प्रभु ने कृपा कर उसे वही प्रदान किया | भगवान के पास जिसने जो देखा उसमें से सबने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार उसे मांग लिया | इस वितरण कार्य में भगवान ने किसी प्रकार की कृपणता नहीं की |

वितरण का कार्य चल ही रहा था कि भगवान के हाथ से शांति गिरकर जमीन पर आ गिरी | भगवान ने उसे अपने पैरों के नीचे दबा लिया |किसी ने भगवान के उस कार्य को नहीं देखा | लेकिन लक्ष्मी जी की नजर से यह घटना नहीं बची | सभी लोग भगवान के पास से अपनी इच्छित सामग्री लेकर चले गए | उसके बाद प्रभु ने पैर के नीचे दबी " शांति " को उठाकर अपने पास रख लिया | इस पर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा - प्रभो ! आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने उत्तर दिया - देवी ! सारे मनुष्य अपनी -अपनी इच्छित सामग्री लेकर यहाँ से चले गए हैं | अब उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं रह गयी है | उनके पास सब कुछ है लेकिन शांति नहीं है | शांति के लिए उन्हें मेरे पास आना होगा| भोग और अशांति से जब वे ऊब जायेंगे , तब उन्हें उसकी तलाश करनी होगी और वह तलाश उन्हें मेरे पास लायेगी | इसकी तलाश से ही उनका कल्याण है |