Friday, January 8, 2010
मानवी गरिमा की सबसे बड़ी कसौटी है -विनम्रता , निरहंकारिता
रूस के राजा एलेक्जेंडर अक्सर अपने देश की आंतरिक दशा जानने के लिए वेश बदल कर घूमने जाया करते थे | एक दिन घूमते - घूमते एक नगर में पहुंचे | वहां का रास्ता उन्हें मालूम न था | राजा रास्ता पूछने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में आगे बढे |आगे उन्होंने एक हवलदार को सरकारी वर्दी पहने हुए देखा | राजा ने उसके पास जाकर पूछा - महाशय ,अमुक स्थान पर जाने का रास्ता बता दीजिये | हवलदार ने अकड़ कर कहा -"मूर्ख ! तू देखता नहीं मै सरकारी हाकीम हूँ ,मेरा काम रास्ता बताना नहीं है | चल हट , दूसरे से पूछ |" राजा ने नम्रता से पूछा -"महोदय ,यदि सरकारी आदमी भी किसी यात्री को रास्ता बता दे , तो कुछ हर्ज थोडा ही है | खैर , मै किसी दूसरे से पूछ लूँगा| फिर इतना तो बता दीजिये , कि आप किस पद पर काम करते हैं |" हवलदार ने और भी ऐंठते हुए कहा -" अँधा है, क्या मेरी वर्दी को देखकर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ ?" एलेक्जेंडर ने कहा - शायद आप पुलिस के सिपाही हैं ," उसने कहा - नहीं उससे ऊंचा |" राजा - " तब क्या नायक हैं ?" हवलदार -" उससे भी ऊंचा |" राजा - "हवलदार हैं ?" हवलदार -"हाँ , अब तू जान गया कि मैं कौन हूँ ?" पर यह तो बता कि इतनी पूछताछ करने का तेरा क्या मतलब ? और तू कौन है ? राजा ने कहा - मै भी सरकारी आदमी हूँ | सिपाही की ऐंठ कुछ कम हुई , उसने पूछा - "क्या तुम नायक हो ? " राजा ने कहा - "नहीं , उससे ऊंचा | " हवलदार - तब क्या... Click here for remaining part
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